91 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी में देशभक्ति का जज्बा कायम

91 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी में देशभक्ति का जज्बा कायम91 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी में देशभक्ति का जज्बा कायम

रुड़की, [रीना डंडरियाल]: परिवार के किसी भी सदस्य को पहचान नहीं पातीं, लेकिन एक बात जो वह कभी नहीं भूलीं, वह है उनके भीतर भरी देशभक्ति की भावना। किसी बच्चे को देखती हैं तो ‘आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’, ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ जैसे देशभक्ति के भाव से ओतप्रोत गीत उनकी जुबान पर खुद-ब-खुद आ जाते हैं।

हम बात कर रहे हैं शिक्षानगरी के चंद्रपुरी मोहल्ले में रहने वाली 91 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी डॉ. सत्यवती सिन्हा की, जिनकी मुल्क को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही। डॉ. सत्यवती के ताऊजी जहां ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन से जुड़े रहे, वहीं दादा-दादी भी स्वतंत्रता सेनानी थे।

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स्वतंत्रता सेनानी एवं उप्र सरकार में शिक्षा मंत्री रहे पति स्वर्गीय जगदीश नारायण सिन्हा से उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा मिली। मूलरूप से बरेली निवासी डॉ. सत्यवती का जन्म 23 जून 1926 में हुआ।

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16 साल की उम्र में उनका विवाह जगदीश नारायण सिन्हा से हो गया। अगस्त 1942 में उनके पति ने डीएवी इंटर कॉलेज से नौकरी छोड़ दी और आंदोलन से जुड़ी गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया। तब रुड़की में भी आंदोलन की हवा चलने लगी थी। उधर, पति की प्रेरणा से आठ मार्च 1942 को आंदोलन में कूद सत्यवती को भी पति ने मुजफ्फरनगर के कांधला से रुड़की बुला लिया। शहर में आंदोलन के उग्र होने पर गिरफ्तारी से बचने को उनके पति मेरठ चले गए। और सत्यवती भी इधर-उधर छिपती रहीं।

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कुछ दिनों बाद पति ने उन्हें मेरठ बुला लिया। इस बीच पति के साथ मेरठ से बरेली जाने की सूचना पुलिस को मिल गई। इसकी भनक लगते ही पति बरेली से एक स्टेशन पहले उतर गए, जबकि सत्यवती बरेली में गिरफ्तार कर ली गईं। काफी दिनों तक जेल में रहने के बाद वह रुड़की लौटीं और आंदोलन में सक्रिय हो गईं।

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उधर, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ आंदोलन में कूदकर भी ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उन्होंने कई जुलूस निकाले। देश को आजादी दिलवाने के इस आंदोलन में उन्होंने अपने जीवनकाल में दो साल से अधिक का समय जेल में काटा।स्वतंत्रता सेनानी डॉ. सत्यवती सिन्हा।

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बच्चों को दी कर्तव्यनिष्ठ बनने की सीख

उम्र के इस पड़ाव में पहुंचने के बाद डॉ. सत्यवती कई बार अपनी स्मरण शक्ति खो बैठती हैं। उनकी बड़ी बेटी किरण कौशिक बताती हैं कि माता-पिता ने हमेशा ही उन्हें देश, समाज और जरूरतमंदों की सहायता करने की शिक्षा दी। दोनों ने ही हमेशा साधारण जीवन जिया। पिता ने उच्च पदों पर आसीन रहते हुए उन्हें भी कभी सरकारी सुविधाओं का उपयोग नहीं करने दिया। जबकि, मां का हमेशा से मानना रहा है कि अधिकार कर्तव्य का दास होता है।

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कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों को अधिकार स्वत: ही मिल जाता है। लेकिन, जिम्मेदारियों का पालन नहीं करने पर मिला हुआ अधिकार भी छिन जाता है। किरण के अनुसार भले ही आज उनकी मां की स्मरण शक्ति कमजोर हो गई है, लेकिन देशभक्ति की भावना में कोई कमी नहीं आई।

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