लोकेश शर्मा, अलीगढ़ : कहने को हम लोग 21वीं सदी में पहुंच गए हैं, मगर ऊंच-नीच और जाति-धर्म का भेद खत्म नहीं कर पाए। कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने इस असमानता की खाई को पाटने के लिए संघर्ष किया और सफल भी रहे। ऐसी ही शख्सियत हैं चंडौस के गांव सुदेशपुर के गोपी। किस्सा 23 मई 2013 का है। गोपी की मां मंदोदरी देवी ग्राम प्रधान थीं। गोपी बताते हैं कि उनकी तयेरी बहन रेखा की बरात आई थी। दूसरे संप्रदाय के लोगों ने बरात को गांव में चढ़ने से रोक दिया। उन्होंने पुलिस व प्रशासनिक अफसरों की मदद ली, मगर दूसरा पक्ष नहीं माना और गांव के बाहर होकर बरात ले जाने की जिद पर अड़ गया। दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए। तत्कालीन एसडीएम गभाना दीपक मीणा, सीओ मुकेश सक्सेना पुलिस के साथ पहुंचे। दूसरे पक्ष को काफी समझाया, मान-मनोव्वल की। कोई हल नहीं निकला। अफसरों की मौजूदगी में बरात को वापस होना पड़ा और दोपहर तीन बजे गाव केपरिक्रमा मार्ग से होते हुए बरात दुल्हन पक्ष के दरवाजे पर पहुंची।

अधिकारों का हनन पांच भाइयों में सबसे बड़े गोपी ने तब अफसरों पर कटाक्ष किया था कि अनुसूचित जाति के लोगों के अधिकारों का हनन हो रहा है, ये कैसा लोकतंत्र है? गोपी बताते हैं कि इससे पहले भी समाज की लड़कियों की बरातें गांव में चढ़ने से रोकी जाती रही थीं। 1989 में तो काफी बवाल हुआ था। गोपी बताते हैं कि अपनी बहन की बरात रोके जाने से वे विचलित हो गए। तब ठान लिया कि ऊंच-नीच की इस खाई को पाटना है।

ग्रामीणों को किया जागरूक समाज में बढ़ रही असमानता की खाई को पाटने के लिए गोपी ने घर-घर संपर्क किया। लोगों को समझाया कि एक ही गांव-समाज में रहकर हम बंटते जा रहे। ये भेदभाव समाज को खोखला कर देगा। इसके लिए प्रशासनिक अफसरों की मदद भी ली, सहयोग भी मिला। तब गांव में समिति गठित हुई। समिति ने गांव-गांव जाकर जनन्यूज़ ऑनलाइन किया। लोगों की समझ में आने लगा कि भेदभाव मिटाकर समाज को स्वच्छ वातावरण और नई पीढ़ी को बेहतर भविष्य दे सकते हैं। तब से अनुसूचित जाति की किसी बेटी की बरात गांव में चढ़ने से नहीं रोकी गई।

By Jagran